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Shobha Shrivastava

Shobha Shrivastava

शोभा श्रीवास्तव जिन संस्कारो में जन्मी और पली उसे उर्दू संस्कारो का परिवेश ही कहा जायेगा। उनके दादा जगत मोहन लाल "रवा" उर्दू के जाने माने शायर  थे और उनके पिता श्री सरोश उन्नावी भी अपनी उर्दू ग़ज़लों की वज़ह से मुशायरों की शान थे। हिंदी का प्रेम शोभा को अपनी माँ कामिनी देवी से प्राप्त हुआ जो खुद हिंदी में कविता लिखा करती थी। साहित्य से उनको लगाव बचपन से ही है और बाल काल से ही वो रचनाये लिखती रही है। प्रकृति परिवेश और मानवीय सरोकारों से वो विशेष रूप से प्रेरित हैं।  उन्नाव नगर में जनमी शोभा श्रीवास्तव अब अपने परिवार के साथ लखनऊ में रहती हैं। 

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बंद थे कलरव मधुर खग-वृन्द के,

                         चेतना के बंद थे निद्रित नयन;  

थे हृदय सन्तोष के परिमल खिले,

                        शान्ति से आबद्ध करता सुख शयन । 

 

बुद्धि की थी ज्योति लय विश्राम में,

                      उर-हताषा जागती ले वेदना;  

विजय-स्वप्नों में बसा कौषल हँसे,

                     थी उनींदी शेष पर संवेदना ।

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