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Dr. Shaista Irshad

Dr. Shaista Irshad

Visiting Faculty        

Department of Humanities and

Social Sciences.    

Motilal Nehru National Institute

of Technology

Allahabad

Personal Detail

Books By Author

Author's Likes

Friday, 06 June 2014 07:32

बेहद है

लो मैं ऐतराफ् करती हू

मुझे तुमसे मुहब्बत है

मुहब्बत से कहीं ज़्यादा

जहाँ इश्क़ की सरहद है

उसके भी बहोत आगे

मेरी चाहत है..जो बेहद है...

तेरे इक़रार से पहले

तेरे इनक़ार क बाद

हर लम्हा तुझे चाहा है

पूजा है सराहा है

इबादत से बहोत ज़्यादा

जहाँ बंदगी की सरहद है

उसके भी बहोत आगे

मेरी चाहत है...जो बेहद है...

यह आँसुओ मे भीगी

तेरी नमकीन रंगत...

यह अधकुली पलकें..

सरगोशियाँ करता

तेरे होठों का सुकूत...

बारिश क रंग मे

धुली सी तेरी पेशानी...

इन सब से हैं

मेरी तनहाईयाँ

सजी हुई...

कौन कहता है की

मैं तन्हा हूँ...?

तेरी संगत मे जो गुज़रे थे

वो लम्हे याद है मुझको

मुहब्बत को जाना था

जब उलफत को पहचाना था

ढले थे सिंदूरी रंग मे

सुरमई शाम क साए

हया के सारे रंग जाना

Friday, 06 June 2014 07:22

ठहर जाने दे

हिज्र का मौसम है

पतझड़ सा

बिखरा हुआ

बिछड़ने से पहले

कुछ पल को

अपनी आँखो मे उतर जाने दे

अपने यह हाथ

मेरे हाथो में ठहर जाने दे

Friday, 06 June 2014 07:19

जिए जा रही हूँ

जिए जा रही हूँ

मिलाने

सुबह से शाम को

फिर शाम को सुबह से

ज़िंदगी अंधेरो और उजलों

के सिवा

कुछ और भी हो सकती थी

मैने चाहा ही नहीं

जिस्म में जान

Friday, 06 June 2014 07:16

अब क्या?

क़िस्मत आज़मा ली....

अब क्या?

मुहब्बत भी पा ली

अब क्या?

सरशार हूँ

गुलज़ार हूँ

नही कोई भी मशगला है अब

तेरे तसव्वुर के हवाले है

भर के जाम जज़्बातों के

पैकर-ए-हुस्न में ढाले हैं

छलक जाता है तेरा दर्द

तेरे लबों के मोतियों में

इन लफ़ज़ो के नशे मैने

कितने मैखाने पी डाले हैं

क़लम में खून भर रही हूँ

थोड़ा जुनून भर रही हूँ

इन आँखो में जो पानी है

मेरी मशक्कत की कहानी है

ना वक़्त साज़गार था

मौसम भी नागवार था

अंधेरोन से ना शनसाई थी

नज़रों में ना बीनाई थी

चुनमुन तुम्हे पता है......

क़ब्र में मुर्दे इंतज़ार करते हैं

कोई अपना आए उनके घर ..बेक़रार रहते हैं

छोटी सी थी मैं..मेरी माँ..मेरा "बचपन" मर गया था

ज़िंदगी के हिसार से छूट कर....रूहों के घर गया था

और पापा.... उनकी उंगलियों की नर्माहट

दम तोड़ गई थी...

अपने बदन का खून निचोड़ के

आ तुझे शादाब कर दूँ

सुर्ख रंगो का घूँघट ऊढा के

हर कली का ख्वाब कर दूँ

बनके पैरहन उन शोख तराशी शाखों पर

सजा के वजूद के हर खम को

खिले तू दियों की तरह मुंडेर पर

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