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Amrit Sagar

Amrit Sagar

 Born in 1984 & Studied in Bihar, Belongs to a Bengoli Kayastha Cultured Family, Living in Delhi since last 10 Years with Family Members, Started to written poem after my Matriculation Exam. Write my most of the poem on "Shringaar Ras", but in others topic too. And most of the Poem are not only poem, its presentation like a song, These all have a particular composition and it can be sing.

In initial stage Wrote all the poem as a hobby, but now struggling to re make my career in this Field. Started to attend Kavi Sammelan and Stage Performance.

Personal Detail

Born on:25-07-1984
Lives in:New Delhi
Contact:09899708685
Email: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

Books By Author

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कि पूजा मैं नहीं करता, नहीं जाता हूँ मंदिर में,

कहाँ कब चैन मिलता है, कभी किसी और के घर में,

कि जिनके घर में माँ बैठी, ख़ुशी, सुख-चैन से सागर,

उसी का घर तो मंदिर है, उसी का घर है मंदिर में !!

न मंदिर है, न मस्ज़िद है, नहीं काबा, न काशी है,

बिना बोले, समझ लेती, वो ममता, माँ की कैसी है,

Monday, 19 May 2014 08:53

वो वक्त के

वो वक्त के, बे वक्त, सदा दे गयी मुझे,

मेरी मोहब्बतों की वफ़ा दे गयी मुझे,

हर वक़्त उसे मैं ही तो लगता रहा गलत,

और अपनी गलतियों कि सजा दे गयी मुझे,

मैं कर रहा था जो भी थी उसको मेरी खबर,

सब जान के अनजानों सी वो बैठी थी यहाँ,

वो थी नहीं, मेरी वो कभी, एक पल को भी,

करीबन सात साल का बच्चा, जिसे फुट पाथ पर देखा था,

वो सोया था के जागा था, माथे को सड़क पर टेका था,

शायद नींद बहुत थी आँखों में, थका हुआ सा भी था वो,

ऊंघ ऊंघ कर जाग रहा था, शायद अभी भी थोड़ा भूखा था,

वो फटे फटे से कपडे थे, जिन चिथड़ों में बैठा था वो,

हाथों से अपनी आँखें मूंदें, रात सड़क लेटा था वो,

जेठ की तपती धरती पर जब, सड़क पे वो दिख जाती है !!

मानो तुम या न मानो, एक हिचक सी उठती जाती है !!

वो धुप कड़ी, वो खड़ी खड़ी, बत्ती पे हाथ फैलाती है,

गोद में छोटा बच्चा लेकर, हर राही से चिल्लाती है,

कुछ खाना दे दो, या पैसे दो, दो दिन से बच्चे भूखे हैं,

पानी तक भी पिया नहीं, होठ भी देखो सूखे हैं,

जिस दिन से मैंने जनम लिया, पाया है अब तक प्यार तेरा,

उस कोख से लेकर, गोद तक तेरी, था सारा संसार मेरा,

मेरी उन छोटी अंगुली को, जिसने पकड़ा और थाम लिया,

मेरी खुशियों की खातिर, सारा दुःख अपने नाम लिया,

उस पवित्र सी पावन नारी को, मैं अपनी माता कहता हूँ

राम सकेरे पिता है मेरे, और माता को सीता कहता हूँ,

हर बात को यूँ तूल दूं, आदत नहीं मेरी,

मैं माफ़ भी करता हूँ, क्षमा मांगता भी हूँ,

हर बार अकड़ जाऊं, मुनासिब नहीं है ये,

रूठों को तो मनाना यहाँ, जनता भी हूँ

माना के हमसे होती है, कई बार गलतियां,

इंसान ही है सब यहाँ, भगवान तो नहीं,

तुमको भी पता है, सभी के बारे में यहाँ,

Monday, 19 May 2014 08:23

तू मेरी है

तू मेरी है, मैं तेरा हूँ, यही इकरार है मुझको,

तू मेरा हर सवेरा है, नहीं इनकार है मुझको,

कोई कुछ भी कहे लेकिन, जो सच में है हकीकत ये,

मैं कितना भी मना कर दूं, तुम्ही से प्यार है मुझको !!

मोहब्बत का मैं शायर हूँ, तू मेरा है ग़ज़ल, सुन ले,

मचलता सा मैं सागर हूँ, तू किनारे कि पहल, सुन ले,

मैं पांच साल की बच्ची हूँ !!

पापा, जबसे तुमने गोद उठाया, माँ, तुमने जबसे नींद सुलाया,

जबसे पावों पर खड़ी हुई, जाने मैं कैसे बड़ी हुई,

आँखों में तुम्हारे जब भी देखा, महसूस किया एक प्यार सा था,

मम्मा की गोदी थी जैसे, मेरा सारा संसार सा था !!

ममता माँ की, पापा प्यार तुम्हारा, नहीं खूब समझ मैं पाती हूँ,

उम्र है छोटी, समझ है कम, हर बार उलझ मैं जाती हूँ,