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Pawan Mishra

Pawan Mishra

व्यवसाय से यांत्रिक अभियंता और चुनाव से कवि एवं लेखक होना मात्र संयोग नहीं था | बचपन से ही साहित्य में रूचि होने की वजह से लेखन को अपने जीवन में अवशोषित कर लिया | हिंदी भाषा में विशेष रूचि होने की वजह से अपनी कविताओ को "अपरिचिता" नाम से पकाशित भी करवा चुके हैं | १ जून १९८३ में जन्में पवन मिश्रा का जन्म उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में हुआ और चंडीगढ़ में पले और बढ़े हुए और वर्तमान में बंगलौर में कार्यरत हैं |

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होगा हिंदुस्तान नया

पलट जायेगा तख़्त तुम्हारा 
रक्त अगर हुंकारेगा 
महक उठेगी धरती फिर से 
वक़्त अगर स्वीकारेगा

पिघल उठेगी सत्ता की गलियां 
फिर चाँद सितारों से 
जब जब लहू उबल उठेगा 
फिर से लाख हजारों में

स्वाति की बूंदों को पीने 
फिर चातक पगलायेंगे 
सुलग उठेगी चिंगारी जब
हम ललकार उठाएंगे

हर पल कल कल दिल में हलचल 
फिर से है ईमान जगा
हर दिल थम थम फिर से करतल 
करते करते रात जगा

कहते कहते सहते सहते 
कितनी काली रत घटी
हर पल मौसम फिर बदलेगा 
ऐसे मन में आस जगी

अपनी मिटटी की रक्षा को 
फिर वो हाथ उठाएंगे 
फिर लहराएगा वो झंडा 
केसरिया फहराएंगे

अमन चैन की नींद सो सके 
ऐसा सपना बुनते हैं 
देशभक्ति की ज्वाला बरसे 
ऐसे माला जपते हैं

 

नित दिन किसी दिन छम छम होगी 
उमड़ेगा तूफ़ान नया 
फिर से प्रेम की धरती होगी 
होगा हिंदुस्तान नया …. .................पवन मिश्रा

उस रात की सुबह बड़ी सुनहरी थी

मैंने देखा उस की खूब सूरती को

वो बहुत खूब सूरत थी

उस रात को चाँद आधा था

मैंने देखा उसमें दाग को

वो दाग बड़ा खूबसूरत था

उस रात को हम न सोये थे

हमने देखा उसे वो चारों ओर थी

वह सचमुच बहुत खूबसूरत थी

उस रात को तारे अगणित थे

अविरक्त भाव से जब जब भी तुमने यूँ कदम बढ़ाये थे

चहक उठे यूँ दर्शक भी ,प्रतिद्वंदी फिर थर्राये थे

जब गेंदें फिर सर्राती थीं बल्ले से वोट कराती थीं

फिर बल्ले से जब टकरा कर वो चहुँ दिशा मुड़ जाती थीं

कभी यहाँ गिरी कभी वहाँ गिरी सर पट यूँ दौड़ लगाती थी

कभी चौक था कभी छक्का था ताली ही बजती जाती थी

कभी विकट हुआ प्रतिकूल कहीं और कहीं बौंसर्स ने मारा

वो कहते हैं हम से हम परिपक्व अभी हुए नहीं हैं

उन्हें ये शिकायत हर पल है हमसे अभी बड़े हम हुए ही नहीं हैं

हमारी शरारत पे उनको गिला है कभी भी न हमसा यूँ कोई मिला है

हमारी हंसीं से वो हैरत में आते

हमारी हंसीं कि हंसीं वो उड़ाते

वो करते हैं बातें हमारी गली में

हमारी गली की इज्जत उड़ाते

तेरी यादों की चादरें जो मजारों पे चढ़ा आयेहैं

उसमे जो मोहब्बतों के फूल निकल आये हैं

उन फूलों की खुशबुको अपने दिल में संजोये हैं

तेरी चूड़ी की कसम वो खनक मेरी दिल की दुआएं हैं

तेरी नथनी की मुस्कराहट को क्या नाम दे

सरकती हुई जब टहलती है तो तेरा ही नाम कहती है

वो मंद हवाएं जब तेरी काया की हल्दी की खुशबु उड़ाती हैं