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Poem(Hindi)

Poem(Hindi) (34)

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- चलो साकार करें डॉ कलाम का सपना –

एक सुंदर सपना था डॉ कलाम की आखों ने देखा

महादेशभक्त ने रची माँ की सुरक्षा में लक्षमणरेखा

सन् २०२० की परिकल्पना है अनोखी उनकी लेखा

आओ देशप्रेमियों करें सपना साकार बनाके एेका

 

हर बच्चे को करें उजले दीप जैसा ज्ञान से तेजस्वी

भारतमाँ का स्वाभिमान रहे अखंड प्रतिभा की छवि

जिस माँ ने पाले करोड़ों बच्चे वे बनें करोडों ज्ञानी

फैलाएँ विश्व में परम धर्म और मानवता की वाणि

 

निकम्मे दानव भ्रष्टाचार का अब खात्मा करना होगा

खा चुका सामाजिक शान्ति बेहिसाब अनर्थ ले भोगा

अपने वतन अपने घर को दिलाएँ इस शैतान से छुट्टि

चलो हमराहियों उठाएँ साथ ताकत की अपनी मुठ्टी

 

नए दौर का करने स्वागत मिलकर जुटाएँ एक आषा

जमींन-ए-वतन की हरियाली चौगुनी करने को तराषा

" दो हाथ एक पेड़ " लगाने का करेंगे संकल्प जो सभी

पुर्ण होगी आत्मनिर्भता की डॉ कलाम की न्यारी सूची

 

चुकाएेंगे किश्ति हम उधार-ए-कुर्बानी मेरे वतन के शहीदों

चलो साकार करें डॉ कलाम का सुंदर सपना देश प्रेमियों

सत् सत् प्राणाम सच्चे देशभक्तों का हर बलिदान सुनहेरा

सारे जहान से प्यारा वो भारत देश है मेरा भारत देश मेरा

 

- Copyrights Meghna Gupta Jogani

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

Sunday, 25 January 2015 05:08

२६ जनवरी

Meghna Gupta Written by
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सरफरोशों की बलि कर रही ऐलान गणतंत्र की विजय

मातृभुमि पर जगमगा रहा मुख़्तल़िफ आज का सुर्योदय

सुनहरी किरणें फैला रही हैं हर दिशा में देशभक्ति प्यारी

ला रहीं जागृरूकता कि परम वन्दनीय है भारतमाँ हमारी

 

छब्बीस जनवरी राजपथ से होती शुरू परेड़ गौरवशाली

अमर जवान ज्योति पर करते अर्पण पुष्पों की श्रद्धांजलि

हर बच्चे के मुख पर छायी है गरिमा छलकता है उल्लास

शहीदों ने तो दी थी कुर्बानियाँ ताकि हो इन्हीं का विकास

 

लाल किले पर इकत्रित हुए सभी आए गर्व से मनाने मौज

बतलाती प्रतिभा जवानों की तैनात है हमारी सतर्क फौज

कहते भारतमाँ को ललकारे जो करेंगे परास्त हर वह षड़यंत्र

दिलों पर खुदा लिखा है "मेरा भारत महान" का अमर मंत्र

 

इक्कीस तोपों की सलामी देती फिर फहरा हमारा तिरंगा

हर धर्म यहाँ जुट होकर ही बनाता है देश हमारा रंगबिरंगा

सेंकडों साँसें गातीं हैं साथ मिलकर जब जब जन गन मन

गूंजता काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरा यह गगन

 

सभी राज्यों की पौषाके करती है प्रदर्शन अद्भुत संस्कृति

"बेटी पढाओ देश बढाओ" का नारा ला रहा नारी-शक्ति

कवच बनकर देश का हौंसला बंधाती हमारी वीर नौसेना

समापन करने आसमान पर दस्तखत करती तेज वायुसेना

(C) Meghna Gupta Jogani .






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होगा हिंदुस्तान नया

पलट जायेगा तख़्त तुम्हारा 
रक्त अगर हुंकारेगा 
महक उठेगी धरती फिर से 
वक़्त अगर स्वीकारेगा

पिघल उठेगी सत्ता की गलियां 
फिर चाँद सितारों से 
जब जब लहू उबल उठेगा 
फिर से लाख हजारों में

स्वाति की बूंदों को पीने 
फिर चातक पगलायेंगे 
सुलग उठेगी चिंगारी जब
हम ललकार उठाएंगे

हर पल कल कल दिल में हलचल 
फिर से है ईमान जगा
हर दिल थम थम फिर से करतल 
करते करते रात जगा

कहते कहते सहते सहते 
कितनी काली रत घटी
हर पल मौसम फिर बदलेगा 
ऐसे मन में आस जगी

अपनी मिटटी की रक्षा को 
फिर वो हाथ उठाएंगे 
फिर लहराएगा वो झंडा 
केसरिया फहराएंगे

अमन चैन की नींद सो सके 
ऐसा सपना बुनते हैं 
देशभक्ति की ज्वाला बरसे 
ऐसे माला जपते हैं

 

नित दिन किसी दिन छम छम होगी 
उमड़ेगा तूफ़ान नया 
फिर से प्रेम की धरती होगी 
होगा हिंदुस्तान नया …. .................पवन मिश्रा

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वो कहते हैं हम से हम परिपक्व अभी हुए नहीं हैं

उन्हें ये शिकायत हर पल है हमसे अभी बड़े हम हुए ही नहीं हैं

हमारी शरारत पे उनको गिला है कभी भी न हमसा यूँ कोई मिला है

हमारी हंसीं से वो हैरत में आते

हमारी हंसीं कि हंसीं वो उड़ाते

वो करते हैं बातें हमारी गली में

हमारी गली की इज्जत उड़ाते

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बंद थे कलरव मधुर खग-वृन्द के,

                         चेतना के बंद थे निद्रित नयन;  

थे हृदय सन्तोष के परिमल खिले,

                        शान्ति से आबद्ध करता सुख शयन । 

 

बुद्धि की थी ज्योति लय विश्राम में,

                      उर-हताषा जागती ले वेदना;  

विजय-स्वप्नों में बसा कौषल हँसे,

                     थी उनींदी शेष पर संवेदना ।

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तेरे तसव्वुर के हवाले है

भर के जाम जज़्बातों के

पैकर-ए-हुस्न में ढाले हैं

छलक जाता है तेरा दर्द

तेरे लबों के मोतियों में

इन लफ़ज़ो के नशे मैने

कितने मैखाने पी डाले हैं

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तेरी संगत मे जो गुज़रे थे

वो लम्हे याद है मुझको

मुहब्बत को जाना था

जब उलफत को पहचाना था

ढले थे सिंदूरी रंग मे

सुरमई शाम क साए

हया के सारे रंग जाना

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यह आँसुओ मे भीगी

तेरी नमकीन रंगत...

यह अधकुली पलकें..

सरगोशियाँ करता

तेरे होठों का सुकूत...

बारिश क रंग मे

धुली सी तेरी पेशानी...

इन सब से हैं

मेरी तनहाईयाँ

सजी हुई...

कौन कहता है की

मैं तन्हा हूँ...?

Friday, 06 June 2014 07:22

ठहर जाने दे

Dr. Shaista Irshad Written by
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हिज्र का मौसम है

पतझड़ सा

बिखरा हुआ

बिछड़ने से पहले

कुछ पल को

अपनी आँखो मे उतर जाने दे

अपने यह हाथ

मेरे हाथो में ठहर जाने दे

Friday, 06 June 2014 07:16

अब क्या?

Dr. Shaista Irshad Written by
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क़िस्मत आज़मा ली....

अब क्या?

मुहब्बत भी पा ली

अब क्या?

सरशार हूँ

गुलज़ार हूँ

नही कोई भी मशगला है अब

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