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Monday, 19 May 2014 08:58

पूजा मैं नहीं करता

Amrit Sagar Written by 
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कि पूजा मैं नहीं करता, नहीं जाता हूँ मंदिर में,

कहाँ कब चैन मिलता है, कभी किसी और के घर में,

कि जिनके घर में माँ बैठी, ख़ुशी, सुख-चैन से सागर,

उसी का घर तो मंदिर है, उसी का घर है मंदिर में !!

न मंदिर है, न मस्ज़िद है, नहीं काबा, न काशी है,

बिना बोले, समझ लेती, वो ममता, माँ की कैसी है,

उसी कि उंगलियां थामे, खड़ा हूँ आज चल कर मैं,

मैं जब भी लड़खड़ाता हूँ, सहारा वो ही देती है !!

मुझे आशीष देती है, कलम मुझसे ये कहती है,

तुम्हारे तीर्थ है पुरे, की माँ जो साथ रहती है,

की माँ का नाम लिखकर के, मेरे सब धाम पुरे है,

उसी के नाम से मेरी, बिगड़ती बात बनती है !!

हमारी संस्कृति है ये, बताती है मुझे मेरी माँ,

की भारत देश है अपना, वो भी तो है हमारी माँ,

बड़ा ही गर्व है खुद पर, घिरे हैं चारो ओरों से,

कभी दुर्गा, कभी काली, कभी बहती सी गंगा माँ !!

चराग़-ए-फ़िक्र, यक़ीनन वो, बुझा के सो, जो जाते है,

वो अपनी माँ के पाओं, दबा के सो जो जाते है,

बिगड़ता है नहीं उनका, जो चाहे सोच ले कोई,

की जिनके सर, कदम माँ के, हवाले हो, जो जाते हैं !!

Read 1632 times Last modified on Monday, 19 May 2014 11:00
Amrit Sagar

 Born in 1984 & Studied in Bihar, Belongs to a Bengoli Kayastha Cultured Family, Living in Delhi since last 10 Years with Family Members, Started to written poem after my Matriculation Exam....
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