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Saturday, 17 May 2014 11:40

" भारत का रत्न कहाते हो "

Pawan Mishra Written by 
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 अविरक्त भाव से जब जब भी तुमने यूँ कदम बढ़ाये थे

चहक उठे यूँ दर्शक भी ,प्रतिद्वंदी फिर थर्राये थे

जब गेंदें फिर सर्राती थीं बल्ले से वोट कराती थीं

फिर बल्ले से जब टकरा कर वो चहुँ दिशा मुड़ जाती थीं

कभी यहाँ गिरी कभी वहाँ गिरी सर पट यूँ दौड़ लगाती थी

कभी चौक था कभी छक्का था ताली ही बजती जाती थी

कभी विकट हुआ प्रतिकूल कहीं और कहीं बौंसर्स ने मारा

फिर कहीं उखड़ते किल्ले थे और कहीं विरोधी दिल हारा

वो देश रहा, परदेस रहा तुम से ही आशा रहती थी

बस तुम्ही विकट पर खड़े रहो जनता कि धड़कन कहती थी

इन सब से तुम अनजान रहे सबके दिल के अरमान रहे

बस एक छोर को पकड़ लिया क्रिकेट के तुम भगवन रहे

जब से कमान तुम ने थामी बस रनों कि प्रगति होती थी

जब कभी विकट तुमने खोया भारत कि जनता रोती थी

वो नहीं खेल का वैभव बस वो थी चरित्र कि गाथा भी

न कभी विवाद में शिरकत थी न कभी

तनी भृकुटियां ही जब जब चरित्र कि बात हुई तुम उधाहरण बन जाते थे

ये नहीं बात बस भारत कि शत्रु से इज्जत पाते थे

तुम युँ ही नहीं बतियाते हो दुनिया से आदर पाते हो

फिर भी मिटटी से नाता है भारत का रत्न कहाते हो

Read 1891 times Last modified on Saturday, 17 May 2014 12:27
Pawan Mishra

व्यवसाय से यांत्रिक अभियंता और चुनाव से कवि एवं लेखक होना मात्र संयोग नहीं...
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