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Saturday, 17 May 2014 11:33

तुम्हें क्यूँ शिकायत ये हर पल है हमसे

Pawan Mishra Written by 
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वो कहते हैं हम से हम परिपक्व अभी हुए नहीं हैं

उन्हें ये शिकायत हर पल है हमसे अभी बड़े हम हुए ही नहीं हैं

हमारी शरारत पे उनको गिला है कभी भी न हमसा यूँ कोई मिला है

हमारी हंसीं से वो हैरत में आते

हमारी हंसीं कि हंसीं वो उड़ाते

वो करते हैं बातें हमारी गली में

हमारी गली की इज्जत उड़ाते

अरे .....क्या उम्र बढ़ गयी है

तो तो क्या हम हँसेंगे नहीं अब ?

शरारत करेंगे तो कलियाँ हँसेंगी

न जाने कितने ही मौसम खिलेंगे

लटकता है मुहं यूँ जरा -सा तो सोचें

यही है वो क्या जिसको कहते हैं बढ़ना

या कहते हो इसको सयानों का झरना

तुम्हें क्यूँ शिकायत ये हर पल है हमसे

अभी तक बड़े हम हुए ही नहीं हैं !!

हमारे ख्यालों के बहते नज़ारे

कभी देख पाते हो बूढ़े किनारे ?

कोई नाप पाया है बूंदों कि उमरें

कभी तुमने देखी मोहब्बत हो बूढी ?

कहाँ नाप पाया है चंदा कि ठंडक

वो इंसान के बस कि बातें नहीं हैं

जरा गोर से देखकर फिर से बोलो

तुम्हें क्यूँ शिकायत ये हर पल है हमसे

अभी तक बड़े हम हुए ही नहीं हैं !!

बने हैं ये इंसान उन्हीं मिट्टियों से

है कच्ची है जीवन कि रेखा हमेशा

कहाँ कोई जीवन किसी का पका है

कहाँ कोई जीवन यूँ बूढा हुआ है

बुढ़ापे को तौलो वो यंत्र अभी तक

शजर के किनारे है खुश्बू उडाता

तुम्हें क्यूँ शिकायत ये हर पल है हमसे

अभी तक बड़े हम हुए ही नहीं हैं !!

Read 1913 times Last modified on Monday, 14 July 2014 11:46
Pawan Mishra

व्यवसाय से यांत्रिक अभियंता और चुनाव से कवि एवं लेखक होना मात्र संयोग नहीं...
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