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Thursday, 15 May 2014 11:10

कुछ कवितायें हैं मेरी...

Balpreet Kaur Written by 
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कुछ कवितायें हैं मेरी

इधर उधर बिखरी पड़ी हैं

कहीं कहाँ कौन सी,

किस मौसम में मेरी उंगलियों से सरक कर पन्नों में सिमट गयी,

हिसाब नहीं है कहीं.

कुछ हैं जो किसी दिन आँखों से बह कर

किसी गुम किताब के आखिरी पन्ने से लिपट गयीं;

और कुछ ऐसी हैं जो रात की चुराई रौशनी में मुझ से मिलकर

जाने किस सपने पर पाँव रख कर खो गयीं;

कुछ ऐसे मिलती रहती हैं

मुझे भूले बिसरे गीतों की तरह दूरदर्शन पे,

और अक्सर ऐसे,

जैसे मिलते हैं धुले हुये दस रुपये के नोट कपड़ों की जेबों से;

और कुछ ऐसे मिल पड़ती हैं

पुरानी चिट्ठियाँ मिलती हैं जैसे

घिसे झोलों और मटमैली किताबों से…

और ऐसी तो तमाम कवितायें हैं मेरी

जो मैने ही बीजी, पाली-पोसी

और

जब वक़्त आया उन्हे समेटने का,

पन्नो पर उतरने से डर गयीं!

ऐसी सहमी हुई, वापिस लौटी हुई कवितायें तो तमाम हैं मेरी

जो कोख़ में ही दम तोड़ कर किसी और की जन्मी हो गईं…

ये कुछ कवितायें हैं मेरी,

मेरी होकर भी अन्जान सी भटका करती हैं

मेरे आस पास, यूँही कहीं….

Read 1797 times Last modified on Saturday, 17 May 2014 10:33
Balpreet Kaur

Assistant Editor (Features) & Entertainment Head                 Day & Night News, Chandigarh  - April 2009 – Present                                        ...
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