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"अस्मिता एक भाव कथा हैं जिसमे घटनात्मकता कम और अनुभूतियों  का चित्रण ही प्रमुख हैं। प्रकृति परिवेश इस अनुभूति व्यंजना में प्रायः घनात्मक , ऋणात्मक रूप में सहयोगी हैं। अस्मिता एक विपदा ग्रस्त नारी के मनोविज्ञान के सम -विषम विकास के जरिये समाज में नारी जीवन की विडम्बना का करुण चित्रण करते हुए सामाजिक परिस्थितियों एवं जड़ मूल्यों पर कशाघात करने के लिए रचा गया भाव काव्य हैं।.

 

 

 

 

 

Quick Reviews

अभी आपकी काव्य कृति (अस्मिता) पढ़ी है, उसके भाषिक सौन्दर्य से मुग्ध हुआ हूँ।.

गोपाल दास 'नीरज '

About The Author

शोभा श्रीवास्तव जिन संस्कारो में जन्मी और पली उसे उर्दू संस्कारो का परिवेश ही कहा जायेगा। उनके दादा जगत मोहन लाल "रवा" उर्दू के जाने माने शायर थे और उनके पिता श्री सरोश उन्नावी भी अपनी उर्दू ग़ज़लों की वज़ह से मुशायरों की शान थे। हिंदी का प्रेम शोभा को अपनी माँ कामिनी देवी से प्राप्त हुआ जो खुद हिंदी में कविता लिखा करती थी। साहित्य से उनको लगाव बचपन से ही है और बाल काल से ही वो रचनाये लिखती रही है। प्रकृति परिवेश और मानवीय सरोकारों से वो विशेष रूप से प्रेरित हैं। उन्नाव नगर में जनमी शोभा श्रीवास्तव अब अपने परिवार के साथ लखनऊ में रहती हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 बंद थे कलरव मधुर खग-वृन्द के,

                      चेतना के बंद थे निद्रित नयन;  

थे हृदय सन्तोष के परिमल खिले,

                      शान्ति से आबद्ध करता सुख शयन । 

 

बुद्धि की थी ज्योति लय विश्राम में,

                       उर-हताषा जागती ले वेदना;  

विजय-स्वप्नों में बसा कौषल हँसे,

                      थी उनींदी शेष पर संवेदना ।

 

भवन सोए सो गई अट्टालिका,

                   जीर्ण कुटिया थी प्रतीक्षा में निरत;  

धन, गुलाबी स्वप्न-सर तिरता हुआ,

                  ताकतीं भूखी कराहें सुख-विरत ।

 

मुस्करा शैषव-नयन सोए हुए,

                         और सस्मित अधर किंचित खुल चुके;  

जागते सूने विवष बंदी नयन,

                         मूक हो कर अश्रु-कण थे ढुल चुके । 

डाल आँचल में जगत की नींद के,

                         निषा ने नूपुर सजाए पाँव में ;  

रत्न-कण नीली चुनरिता में भरे,

                         नाचने आई प्रकृति के गाँव में ।